तंगदिल इंसान……../गज़ल

आजकल हर शख़्स परेशान नज़र आता है |

अपने ही घर में मेहमान नज़र आता है ||

फैलाता है हाथ अपने, सिर्फ़ मांगने वास्ते,

बड़ा तंगदिल हर इंसान नज़र आता है ||

नहीं पिघलते दिल अब आंसुओं को देखके,

ये शहर मुर्दों का शमशान नज़र आता है ||

बाँध रखे हैं हाथ सबने, दिल भी मार बैठे हैं,

एक फांसला सब दरमियान नज़र आता है ||

शैतान घूमता खुलेआम, बदतर हालात हुए,

बंद तालों में कैद भगवान नज़र आता है ||

जी रहे हैं ज़िंदगी इस तरह से लोग ‘माही’,

जैसे ज़िंदगी पर करते अहसान नज़र आता है ||

:- महेश कुमार कुलदीप ‘माही’
जयपुर

2 Comments

  1. Chirag Raja 08/08/2015
    • mkkuldeep mkkuldeep 09/08/2015

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