लड़की ….. / कविता

छुपा गई वो आँख में जो नमी थी |

ये हुनर था उसका या बेबसी थी ||

न बजी थाली न मंगलाचार हुआ,
मातम माना उत्सव बेकार हुआ,

वो बेटा नहीं लड़की बन जन्मी थी |

छुपा गई वो आँख में जो नमी थी ||

याद नहीं माँ ने कब पुचकारा था,
कब चूमे थे गाल कब दुलारा था,

पर याद है जब-जब तन्हा जली थी |

छुपा गई वो आँख में जो नमी थी ||

बिना अपराध सजा वो पाती रही,
पेट के लिए बचा-खुचा खाती रही,

हर दर्द सहकर भी सदा वो हँसी थी |

छुपा गई वो आँख में जो नमी थी ||

कच्ची उम्र में दान हुई ब्याही गई,
हाड़-मांस के पुतले सी चाही गई,

यही उसकी किस्मत और ज़िंदगी थी |

छुपा गई वो आँख में जो नमी थी ||

:- महेश कुमार कुलदीप ‘माही’

4 Comments

  1. Lalitkuldeep lalit kuldeep 08/08/2015
  2. Chirag Raja 08/08/2015
    • mkkuldeep महेश कुमार कुलदीप 'माही' 10/08/2015
  3. mkkuldeep महेश कुमार कुलदीप 'माही' 10/08/2015

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