उसकी यादों की रेत मेरे हाथों से फिसल रही थी

इक तरफ उसकी यादों की रेत हाथों से फिसल रही थी ,
समंदर की लहरें भी उसकी यादों को अपने में समेट रहीं थी ….
और इधर ये नादान मन,
इश्क़ के बारिश की आस लगाये बैठा था….
मेरे तन्हाई के मरुस्थल में मोहब्बत की दो बूँद जरूरी थी ….
बादल तो छाये थे पर उसके प्यार के नहीं ……
हवा चली थी पर उस फ़िज़ा में प्यार की खुशबू नहीं…..
बीते लम्हों की याद तो मेरे साथ थी पर वो नहीं ……
उसके क़दमों की आहट की गूंज मेरे कानो में थी पर वो नहीं……
दुनिया की रुस्वाई बर्दास्त थी मुझे पर उसकी नहीं ……
ऐसा लगा मानो हमारे बीच मजबूत नाराज़गी की दीवार आ खड़ी थी …..
मैंने बहुत कोशिश की उसे तोड़ने की,
पर कोशिश मुकम्मल नहीं हो पाई …..
चारो तरफ सिर्फ उदासी ही थी छाई….
मेरे इस दर्द में बरसाती रात भी बरसना भूल गई थी…..
ऐसा लगा चाँद ने भी चकोर को देखना छोड़ दिया……
जब उसकी यादों की रेत मेरे हाथों से फिसल रही थी ……

Leave a Reply