ख़्वार मतलबी ज़माना निकला / गज़ल

ख़्वार मतलबी ज़माना निकला |

हर शख़्स बड़ा सयाना निकला ||

परखने जो अपनों को निकला,

हर अपना मेरा बेगाना निकला ||

ज़ख्म नए थे मेरे लेकिन,

दर्द का सबब पुराना निकला ||

ऐलान सजा का जब भी हुआ,

महज़ एक नाम हमारा निकला ||

परियों की जो कथा सुनी थी,

वो फकत एक फ़साना निकला ||

कहता ‘माही’ सुनो तुम यारो,

मैं बनके एक दीवाना निकला ||

:- महेश कुमार कुलदीप ‘माही’
जयपुर

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  1. mamta kamal 07/08/2015

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