कल फिर जाना है

शीर्षक —>कल फिर जाना है.

सिर पे टोकरी,
नंगे पावं,
अहले सुबह ही,
वो घर से निकल जाती है.
अपने दुधमुँहे बच्चे को ,
अपनी बारह साल की बेटी के ,
भरोसे छोड़ जाती है
राहो में पड़े कंकड़ भी ,
उसे डिगा नहीं पाते हैं .
हर गली हर गाँव में ,
वो “फल ले लो ” की मीठी आवाज निकलती है .
दोपहर होते ही ,
पेड़ की छावं में टोकरी उतारती है ,
रात की बासी रोटी और साग को ,
बड़े ही चाव से खाती है .
बांकी बचे फलों को जल्दी-जल्दी बेच जाती है .
माथे पर बच्चो की चिंता की लकीरे ,
अंगोछे में पैसे बंधे हुए ,
लम्बे डग भरते हुए ,
वो चलती जाती है .
घर जाते जाते उसे ,
शाम हो जाती है .
शराबी पति उसका बाट जोहता रहता है ,
उसके पहुँचते ही ,
उसके रुपये की गठरी छीन जाता है .
बच्चे माँ- माँ कह कर उससे लिपट पड़ते है.
माँ तो माँ होती है ,
वो बच्चो को दुलारती -पुचकारती है ,
फिर ,
रात का खाना बनाती हैं .
और फिर ,
खुली आँखों से ,
वो सो जाती है ,
ये सोचते हुए की ,’
कल फिर जाना है .