मुरशिद से अक्सर ये बाते सुनी है ।

मुरशिद से अक्सर ये बाते सुनी है ।
जुलाहे ने शिद्दत से चादर बुनी है ।

ग़म और ख़ुशी के पिरोए है धागे ।
इन्हीसे तो जीने के अरमान जागे ।
बड़ा खूबसूरत है उसका क़सीदा ।
धड़कन की नाज़ुक नक़्क़ाशी बनी है ।
मुरशिद से अक्सर . . .

दिल की तरंगों से उड़ती है चादर ।
लमहों के रंगों में डूबी है चादर ।
अबतक भटकते सुरों को समाने ।
सांसों ने चादर की जन्नत चुनी है ।
मुरशिद से अक्सर . . .

अफ़सोस आगे ना रखना किसी से ।
चादर का हर एक ज़र्रा उसी से ।
जबतक वो चाहे लपेटो ये चादर ।
जिसको मिलेगी बस वो धनि है ।
मुरशिद से अक्सर . . .

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