बाजार

शाम होते ही ,
सजने लगती है बाजारे,
कहीें से मुजरे की आवाज ,
कहीं से तबले की थाप ,
फर्श पर थिरकते कदम ,
कानो में रस घोलती ,
घुंघरुओं की आवाज ,
लुभाते है हर मन को .
वाह-वाह के नारे में दब जाती है,
उनकी साँसों की आवाज .
उनके आंसू भी,
खरीद लिए जाते हैं .
महफ़िल में लगे झुम्मर भी ,
उनके अँधेरे को मिटा नहीं पाते हैं.
बिक जाती है उनकी सिसकियाँ भी ,
इस बाजार में .
सुबह होते ही ,
फिर से वो सजने लगती है ,
क्योंकि ,
आज की शाम,
फिर लगेगी ,
बाजार.

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