अधूरी आरजू ….

करीब मंजिल के भी क्यूँ
ये दूरी रह जाती है…
सुनसान सी राहों पर भी
कुछ मजबूरी रह जाती है…
निगाहों में सारा जमाना
समेटे हुए चलते हैं हम…
मिलता है सारा जहाँ पर
आरजू अधूरी रह जाती है

अपनी ख्वाइशों को
अब मैं क्या कहूँ…
अपनी हसरतों को
पूरा कैसे करूँ…
दिल में कुछ यादें
भूली बिसरी रह जाती हैं….
मिलता है सारा जहाँ पर
आरजू अधूरी रह जाती है

One Response

  1. abhi 07/08/2015

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