मिले तुम्हारे ख़त …. / गज़ल / महेश कुमार कुलदीप

मिले तुम्हारे ख़त पुरानी दराज में |

अभी तलक है ज़िंदा उसी रिवाज में ||

कम नहीं उदासियाँ तन्हाइयाँ मेरी,

सिमट पाती नहीं मेरे तो मिजाज़ में ||

कदम तुम्हारे रुके रुके से थे लेकिन,

असर न था मेरे इश्क़ की आवाज़ में ||

बड़े बेरहम हैं होते जमाने के दस्तूर,

ज़रा भी नरमी नहीं रखता लिहाज़ में ||

आसान मत समझ ‘माही’ संग्राम को,

ज़िंदगी लुट जाती है तख़्त औ’ ताज में ||

:- महेश कुमार कुलदीप ‘माही’
+8511037804
जयपुर, राजस्थान

2 Comments

  1. Chirag Raja 06/08/2015
    • mkkuldeep महेश कुमार कुलदीप 'माही' 07/08/2015

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