खुशनुमा पल

वो खुशनुमा पल
कैसे भुलाए भुला जाता
जब एक पुत्र अपने पिता के
जरुरतो को पुरा कर सकता है
किसी की मुखदर्पन में
संतुष्ति के झलक देख के
मन प्रसन्न हो उठता है
कोई मेरे दर्दे दिल को कैसे समझे
मैं सबके लिए कुछ करना चाहता हुं
पर मुझ से हो न पाता
चीजों से भरी हुई बाजार
दिल में अनगिनत सपने
पर हथेली है खाली
करे भी तो क्या करे
दिल को मार के जीना पड़ता है
अरमानों का गला घोटना पड़ता है
उम्मीद की किरण नजर नही आती
मौका भी दूर भागता है हमें देख के
शायद वक्त हमारा भी आयेगा
आयेगा एकदिन
जिस दिन में सिर्फ मेरा ही नाम लिखा होगा
लेकिन………
देखने के लिए
सुनने के लिए
सराहने के लिए
कोई न होगा……..
जा चुका होगा
बहुत दूर….
जिन सब के लिए मैं कुछ करना चाहता था….
किसको मिलेगी खुशी
क्या होगा तब
कु्छ बनु तो अभी क्यों न बनु
जो खुशनुमा पल मैं…
अभी सबके साथ बिता पाऊ
पर होता कब है
किस्मत कोई किसी को ही अजमाता है
है न???

-किशोर कुमार दास