।।ग़ज़ल।।मुझे मोहलत नही देती ।।

।।गज़ल।।मुझे मोहलत नही देती ।।

कौन कहता है कि तू झलक-ऐ-जन्नत नही देती ।।
पर ये दुनिया तुम्हे देखने की इजाजत नही देती ।।

कसम तो खायी थी मैंने कभी न दिल लगाने की ।।
तुझे न देखू तो आँखे मुझे राहत नही देती ।।

पलटकर देख लेते तो तुम्हारा क्या बिगड़ जाता ।।
तुम्हारी सबनमी पलके मुझे मोहलत नही देती ।।

तुमारी शान्त सी चितवन, तुम्हारी झील सी आँखे।।
करू मैं लाख कोशिक पर कोई हलचल नही देती ।।

तुम्हारे चाँद से चेहरे से, मेरा दिल धड़कता है ।।
नजर की सादगी इतनी कोई आहट नही देती ।।

करू मैं लाख कोशिस पर इरादा टूट जाता है ।।
नजर मैं भी चुराता न, तेरी चाहत नही देती ।।
…….R.K.M