अस्तित्व

कितना करवा हुं मैं
हर कोई मुझसे दूर भागता है
बहुत कमी है मुझ में
शायद…..
तभी तो…..
सालों गुजर गए
अरसों बीत गए
जो मैं पाना चाहता था
पाते पाते नजदीक से गुजर गया
पर कभी मिला ही नही
आज तक………
ढूंढता ही रहा…..
कितना तड़प है मुझ में
कितना तरसता हुं मैं
पर मुझ पे कोई तरस नही खाता
काश मेरी झोली में कुछ आ जाये
भीख की तरह…..
क्या मैं इतना गिर गया हुं?
अपने आप को ढकने की कोशिश करता हुं…
पर मुझे भेद कर किसी ने देखा ही नहींं
मैं क्या हुं?
पर जरुरते मेरी है
मेरी जरुरत किसी को नही
कोई मेरे बहुत करीब आता है
पर जितना आता है,
उतना दूर भी चला जाता है
लाख कोशिशों के बावजुद
हथेली जैसे सुना ही रहता है..
जैसे क्यों?
रहता हैं….
आखरी सांस तक रहेगा
ये सुनापन
ये तड़प
ये दर्द
क्यों कि मैं जानता हुं
मेरा अस्तित्व क्या हैं!!!

-किशोर कुमार दास

Leave a Reply