ग़ज़ल –: ये नीर नही इन आखों के !!

हम डूब रहे मझधारे पर , मुश्किल से भरे किनारे है !
ये नीर नही हैं आखों के , ये तो गिरते अन्गारे हैं !!

हस कर पार किये थे हम , बडे-बडे तूफानो को !
अब अपनो ने जख्मी किये , हर लम्हे यहां गवारे हैं!!

आज भवर मे फसे-फसे हम, चीख रहे चिल्ला रहे !
बचना शायद मुश्किल होगा , यहां नफरत के गलियारे है !!

समझ रहे थे जैसे सावन , शीतल निर्मल मनभावन !
ये तपती तेज दुपहरी मे , ज्वाला की बौछारें है !!

नातों के नाजुक ये बंधन , ढह ना जाये ठोकर से !
जरा सम्हल कर रहना होगा , ये सीसे की दीवारे हैं !!

अनुज तिवारी “इन्दवार”

4 Comments

  1. राम केश मिश्र राम केश मिश्र 05/08/2015
  2. राम केश मिश्र राम केश मिश्र 05/08/2015
  3. Er. Anuj Tiwari"Indwar" Anuj Tiwari"Indwar" 05/08/2015
  4. Er. Anuj Tiwari"Indwar" Anuj Tiwari"Indwar" 05/08/2015

Leave a Reply