ग़ज़ल – जो सच कह दूँ तो फिर से एक रिश्ता टूट जाएगा

किसी दिन ख़त्म होगी डोर, धागा टूट जाएगा –
अचानक ज़िन्दगी! तुझसे भी नाता टूट जाएगा –

जो बोलूँ झूठ तो खुद की निगाहों में गिरूँगा मैं
जो सच कह दूँ तो फिर से एक रिश्ता टूट जाएगा –

बस इतनी बात ने ताउम्र हमको बाँधकर रक्खा
किसी के दिल में कायम इक भरोसा टूट जाएगा –

चराग़ों ने ये जो ज़िद की है अबकी आजमाने की
हवा का हौसला भी, देख लेना, टूट जाएगा –

वो हों जज़्बात या फिर कोई नद्दी हो कि दोनों में
उफ़ान इक हद से ज्यादा हो, किनारा टूट जाएगा –

ये शीशे सिर पटक कर रोज़ ही फ़रियाद करते हैं
तो क्या इतने से पत्थर का मसीहा टूट जाएगा –

One Response

  1. Er. Anuj Tiwari"Indwar" Anuj Tiwari"Indwar" 05/08/2015

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