पिता जी

एक पल भी आरम नही हैं,
जब से बोझ उठाया हैं,
जीवन के इस रंग भवर में,
फंसता ही चला गया हैं ।

बीत गए दिन खुशियों के इनकी,
अब मुश्किल घडियां आइ हैं,
पिता जी बाडी मुश्किल से यहाँ,
अब दो पैसा कमऐं हैं ।

अपने को परेशान करके,
परिवर को उंचा उठाया हैं,
एक पल भी आरम नही हैं,
जब से बोझ उठाया हैं ।

सुबह उठ है काम पे जाना,
पिता का धर्म् हैं इन्हें निभना,
रो परती हैं नाजुक आंखियॉ,
जब ना सके वें इसे निभना ।

थी मन में आशाऐं अनेंक,
पुरा न कियें कोइ भी एक,
मार दियें चहत को अपने,
तड. दियें सभी अपने सपने ।

एक पल भी आरम नहि हैं,
जब से बोझ उठया हैं,
जिवन के इस रंग भव्र मे,
फंसता ही चला गया हैं ।

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