ज़ालिम दुनिया

सफर में था मैं अकेले……
मरहम -ए-दर्द तलाशने चला था ,
पर मालूम न था ये ज़ालिम दुनिया…..
मुझे जख्म -ए -दर्द और दे जाएगी……..
बरसों बाद सुकून की नींद नसीब हुई …..
तो आशियाने -ख्वाब ढूंढने चला था……
पर मालूम न था ये ज़ालिम दुनिया ……
मेरी सुकूने-नींद को कुचल जाएगी ……
गम के पन्नो को बंद करके ,आगे ही बढ़ा था …..
और आलम-ए-ख़ुशी टलोलने चला था ….
पर मालूम न था ये ज़ालिम दुनिया…..
मुझे मेरी औकात याद दिला जाएगी ……
इन्साफ की तलाश में भटक रहा था…….
इन्साफ के अदालत का दरवाज़ा खटखटा रहा था …
पर मालूम न था ये ज़ालिम दुनिया…..
मुझे ही मुजरिम करार कर जाएगी …..
सफर में था मैं अकेले …
बिखरे रिश्तों को बटोरने चला था ..
पर मालूम न था ये दुनिया…..
मेरे रिश्तों में शिगाफ़ डाल जाएगी …..

One Response

  1. Er. Anuj Tiwari"Indwar" Anuj Tiwari"Indwar" 04/08/2015

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