लाल सलाम

मैं क्या करता,
विवश था मैं ,
मजबूर था मैं .
क्योंकि
मेरे बूढ़ेबाप को दमे की बीमारी थी .
मेरी चार चार बहने ,
खरपतवार की तरह बढ़ती ही जाती थी
मुट्ठी भर चावल से पेट भरना ,
इतना आसान न था .
मुझे तो रहने के लिए इंदिरा आवास भी न था
क्योंकि ,
मुखिया को देने के लिए पांच हजार नहीं था .
मैं गरीब होते हुए भी ,
अमीरो के ए पी ल में था .
जिसके पास कहने जाता ,
वही दुत्कार देता था .
कहीं बात बन भी जाती अगर तो ,
घूस देना मेरे बस का बात नहीं था .
बूढ़ा बाप मर गया एक दिन ,
कफ़न खरीदने से भी लाचार था मैं .
दिवाली की रात ,
जब पटाखे छूट रहे थे ,
वो मेरे लिए मसीहा बन कर आया .
रोटी तुझे मांगने से कोई नहीं देगा
रोटी छीननी पड़ती है ,
गले काटने पड़ते है .
इतना कह कर थमा दी बन्दुक ,
और मुझसे कहा,
लाल सलाम .

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