पहले जब देखा तुमको तो

पहले जब देखा तुमको तो
तुम मंदिर के इक पत्थर थे।
पर मेरे सब जटिल प्रश्न के
बस तुम ही तो इक उत्तर थे।

माँ ने मुझसे यही कहा था
तुम ही जग के रखवाले हो।’
करो प्रार्थना, शीश नवाओ
भक्तों से तुम मतवाले हो।’

माँ के कहने पर तब मैंने
माना तुम ही भगवन थे।
करी प्रार्थना तब यह पाया
तुम शब्दों के हर अक्षर थे।
पहले जब देखा तुमको तो
तुम मंदिर के इक पत्थर थे।

जीवन तो सब जी लेते हैं
संकट में घिरते रहते हैं।
और हताशा हाथ लगे तो
तुम्हें कोसते बस रहते हैं।

जहरीले विषधर से सब जन
समझ रहे खुद को चंदन थे।
पर जब जीवन कण में देखा
हम ही पीड़ा के अंकुर थे।
पहले जब देखा तुमको तो
तुम मंदिर के इक पत्थर थे।

और पाप जो हम करते हैं
अहं तले तड़पा करते हैं।
नहीं स्वयं को समझ सके तो
औरों से झगड़ा करते हैं।

मार काट जब मची जगत में
तुम ही गीता के दर्शन थे।
गूँजे थे जो चहूँदिशा में
वो गीता के ही अक्षर थे।
पहले जब देखा तुमको तो
तुम मंदिर के इक पत्थर थे।

जन्म-मरण का ज्ञान किसे था
साँसों का संज्ञान किसे था।
कफन ओढ़ बस जीने का
अर्थ नहीं है, ध्यान किसे था।

सभी कला थे उसी काल के
जिसकी छवि के तुम दर्पण थे।
नृत्य काल का दिखा रहे थे
वो तुम ही जग परमेश्वर थे।
पहले जब देखा तुमको तो
तुम मंदिर के इक पत्थर थे।

जग-बाग में पेड़ अनेक थे
सब पतझर से मगर लदे थे।
और आँधी के तेज सफर में
ठूँठ बने कुछ देर खड़े थे।

प्रलय अनोखा पर तुम लाये
जिसने तोड़े हर बंधन थे।
पर जो शाखें गिरती जावें
उन सबके तुम अमर शजर थे।
पहले जब देखा तुमको तो
तुम मंदिर के इक पत्थर थे।

चलती साँसें ये क्या जानें
यूँ कब तक रुक रुक चलना था।
रग का लहू भी पूछ रहा था
कब उसको तन में रुकना था।

और हृदय भी सोच रहा था
कितने शेष बचे कंपन थे।
पर इन सारे प्रश्नों के तो
मौन बने तेरे उत्तर थे।
पहले जब देखा तुमको तो
तुम मंदिर के इक पत्थर थे

पर मेरे सब जटिल प्रश्न के
बस तुम ही तो इक उत्तर थे।
—– भूपेन्द्र कुमार दवे

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