तल्खियाँ

मुझे वो हमेशा समझ लेगा, यही गुमान-ए-सुकून था
मेरा हाथ वो भी छुड़ा रहा कभी मुझपे जिसको ग़ुरूर था

ये जो ताल्लुक में हैं तल्खियाँ न मुझे, न उसको क़ुबूल था
थे जो तल्खियों में ताल्लुक बने तभी दोस्ती का उरूज था

ना मैं बात अपनी कभी कह सका, न तुझे ही कोई ध्यान था
कभी तुम ख़फा कभी हम ख़फा, यही दोस्ती का ज़वाल था

यूँही दूर रह के हैं घुट रहे एक दूसरे से न कह रहे
यूँ राज़ बन के रह गया जो तेरा मेरा सवाल था

–नितिन

5 Comments

  1. संध्या गोलछा 04/08/2015
  2. Er. Anuj Tiwari"Indwar" Anuj Tiwari"Indwar" 04/08/2015
  3. Dr. Nitin Kumar pandey Dr. Nitin Kumar pandey 04/08/2015
  4. Rinki Raut Rinki Raut 04/08/2015
    • Dr. Nitin Kumar pandey Nitin 05/08/2015

Leave a Reply