विधि के विधान की कारा

तोड़ना नही सम्भव है,
विधि के विधान की कारा ।
अपराजेय शक्ति है कलि की,
पाकर अवलंब तुम्हारा ॥

श्रृंखला कठिन नियमो की,
विधना भी मुक्त नही है ।
वरदान कवच से धरणी ,
अभिशापित है यक्त नही है॥

हो अजेय शक्ति नतमस्तक ,
पौरुष बल ग्राह्य नही है।
तप संयम मुक्ति विजय श्री ,
रोदन ही भाग्य नही है॥

-डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल “राही”

Leave a Reply