उनकी महफ़िल के हम भी तलबगार है / महेश कुमार कुलदीप ‘माही’

उनकी महफ़िल के हम भी तलबगार है |

पर मेरे हिस्से में गुनाह हज़ार है ||

न शिकवा कभी न गिला हमसे,

इसी बात से हम सदा शर्मसार है ||

एक हम ही नहीं उनकी जिंदगी में,

जमाने के और भी दर्द बेशुमार है ||

वो पागल है चाहत की दौलत पाकर,

और हम जमाने भर के समझदार है ||

अपने सिर ले लिए गुनाह सारे इश्क़ में,

वो आज भी मेरा सच्चा मददगार है ||

तराशता है मुझको हर कदम साथ चल,

कभी वो सुनार तो कभी कुंभकार है ||

करीब लाता है औ’ सीने से लगा लेता है,

वो साँसों का बन जाता राज़दार है ||

2 Comments

  1. Er. Anuj Tiwari"Indwar" Anuj Tiwari"Indwar" 05/08/2015
    • mkkuldeep mkkuldeep 05/08/2015

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