डर तो इस बात का है ….

ज़िन्दगी की अंगीठी सुलगी हुई है ,
हवा के साथ लपटें भी तेज हैं ,
तन्हाई के समुन्दर में एक बूँद पानी नहीं ,
कहीं मेरे अरमानों का समां जल ना जाये ,
डर तो इस बात का है …..

फंसा हूँ ज़िन्दगी के गहरे भँवर में ,
हवा के साथ लहरें भी तेज़ हैं ,
भटका हुआ राही बन गया हूँ ,
कहीं मेरी उम्मीदों का जहाज डूब ना जाए ,
डर तो इस बात का है ……..

खोया हूँ अतीत के पन्नों में ,
दर्द के साथ जख़्म भी गहरे हैं ,
इस ज़ख़्म के लिए कोई मरहम नहीं ,
कहीं अतीत का ज़ख़्म बर्बाद न कर दे ,
डर तो इस बात का है ….

पर इन सब को भूलकर मैं,
नयी शुरूआत करना चाहता हूँ ,
मन की भी यहीं मर्ज़ी है और दिल की भी ,
लेकिन फिर से कहीं किस्मत रुख ना पलट ले ,
डर तो इस बात का है …….

(अंकिता आशू)

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