इतिहास

अभी अभी गुजरा है
रुढि़यों का
अंधविश्वासों का
गुलामी का
तानाशाही का
गटर के कीड़ों के मानिंद
उफनते इंसानी मूल्यों का इतिहास।

अब बन रहा है
अमीरों के कदमों तले
दबे उफनते गरीबों का
भ्रष्टाचार का
बलात्कार का
देह के व्यापार का
और –
किसानों के आत्महत्या का
इतिहास।

अब प्रश्न ये है –
क्या ऐसे ही होगा
इतिहास का निर्माण ?
अगर ऐसा होता है तो
इस निर्माण में
लुप्त हो रहा है हमारा इतिहास !

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