जिन्दगी थकी न थी …. —- भूपेंद्र कुमार दवे

जिन्दगी थकी न थी ….

जिन्दगी थकी ना थी कि मौत द्वारे आ गई
मुस्कुराती गोद थी, आँसूओं को भा गई

फूलों की सुगंध थी रंग बिरंगे लिबास में
चहक रही थी चाँदनी जाने किसकी आस में
नाचती थी डालियाँ भी खिलखिलाती रास में

पर उम्र के ढलान पे साँस कुछ भरने लगी
दीप बुझते देख के अर्थी खुद जलने लगी

जिन्दगी थकी ना थी कि मौत द्वारे आ गई
मुस्कुराती गोद थी, आँसूओं को भा गई
….

घूँट दो पीने चला तड़पा हुआ था प्यास में
लड़खड़ाता चलता रहा टूटा घड़ा ले साथ में
बूँद पर एक ना मिली जिन्दगी की तलाश में

सफर अधूरा ही रहा पाँव भी कँपते रहे
हर कदम थकान थी गिरते रहे, चलते रहे

जिन्दगी थकी ना थी कि मौत द्वारे आ गई
मुस्कुराती गोद थी, आँसूओं को भा गई
….

दूर का सफर था, चलते रहे इक आस में
कसमसाती उम्र थी बस मुस्कुराती लाश में
बैसाखी भर लिये रहे चरमराती पास में

नीड़ था उजड़ा हुआ, पंख पसरे जलते हुए
चहचहाते कुछ गीत थे कंठ में बिखरे हुए

जिन्दगी थकी ना थी कि मौत द्वारे आ गई
मुस्कुराती गोद थी, आँसूओं को भा गई
….

डूबी न थी, टूटी न थी, तैरती थी आस में
नाव में कुछ साँस थी, हौसला था कुछ पास में
पर जोश में ऊँची लहर नाव लेकर बाँह में

दे चुकी पतवार जाने किस अभागे हाथ में
जब किनारे छिप रहे थे दूरियों के माँद में

जिन्दगी थकी ना थी कि मौत द्वारे आ गई
मुस्कुराती गोद थी, आँसूओं को भा गई
….

खुली न थी, खिली न थी फिर भी कलियाँ झर गईं
शूल के शवों पर वो भी षिथिल होकर गिर गईं
तजकर सिसकती साँस बस जिन्दगी गुजर गई

काठ पर ना समा सकीं ठाठ की हर गुदड़ियाँ
अशर्फियाँ के दाम पर बिकती रहीं सिसकियाँ

जिन्दगी थकी ना थी कि मौत द्वारे आ गई
मुस्कुराती गोद थी, आँसूओं को भा गई
….
—- ——- —- भूपेंद्र कुमार दवे

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