मैंने सोचा —- भूपेंद्र कुमार दवे

मैंने सोचा

मैंने सोचा मैं भी गुंजन गीतों का बन जाऊँगा
गुंजन करते भोंरे-सा मैं फूलों पर इतराऊँगा

तुम से ही संगीत जगा है
चुप वाणी से गीत सजा है
तेरे कारण कोयल कूकी
बुलबुल की मृदु बोली फूटी
मुस्काते अधरों पर तूने
गीतों का श्रंगार सजाया
देने कुछ वरदान स्वरों को
सरगम को उपहार बनाया

मैंने सोचा मैं भी गुंजन गीतों का बन जाऊँगा
पर पाकर टूटी वीणा मैं गीत नहीं गा पाऊँगा

तुमने ही भौरों को पाला
बगिया का भी पथ दिखलाया
माला गूँथी, गजरे महके
अधरों पर कंपन भी उभरे
फूल, पंखुड़ी में प्यार जगाने
प्यार लुटाने महक उड़ाई
प्यार जताने कलियों में भी
मुस्कानों की हुनर जगाई

मैंने सोचा मैं भी जीवन में प्रिय मधुमास बनूँगा
मगर छली के छल से परिचित मैं प्रीत नहीं कर पाऊँगा

तन का, मन का, सब जीवन का
मुक्ति, भक्ति, सिद्धि, बुद्धि, धन का
तू तो अद्भुत मीत बना है
दर्प, अहं सब जीत चुका है
तूने जग के सब प्राणी को
कौस्तुक मणि सा रूप दिया है
तूने सबकी मन गंगा में
निर्मल जल का संचार किया है

मैंने सोचा मैं जग में सब के मन का प्रिय बनूँगा
पर पहने अहं मुखौटा मैं मीत नहीं बन पाऊँगा

तुमने विष तक पी डाला है
उसको अमृत रूप दिया है
तुम तो पत्थर रूप धरे हो
पूजे जाने योग्य बने हो
पर तुम ज्ञात अज्ञात सभी हो
शून्य पूर्ण की परिभाषा हो
तुम प्रकाश की परिसीमा में
अंधकार की अभिलाषा हो

मैंने सोचा मैं भी तुम जैसा कुछ कर अमर बनूँगा
पर साँसों की अल्हड़ता को मैं जीत नहीं पाऊँगा .
—- ——- —- भूपेंद्र कुमार दवे
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  1. ushakiransharma10@gmail.com ushakiransharma10@gmail.com 09/07/2015

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