श्री हनुमान चालीसा

गणपति का कर ध्यान सरस्वति करूँ वंदना |
पवन पुत्र हनुमान धन्य है मातु अंजना ||
राघव के प्रिय दास वीर विक्रम बजरंगी |
शरणागत शिवदास सिद्धि दो सज्जन संगी ||

जय अंजनि पुत्र कपीश्वर की | जय संकटमोचन ईश्वर की ||
जय स्वर्णिम वर्ण निरन्जन की | जय ईश सदा दुःख भंजन की ||
जय विक्रम वीर सुधीर कपी | जय केसरि पुत्र अनन्त तपी ||
शिव अंश समीर सुपुत्र अहो | कपि कुंजर आप कृपालु रहो ||
हनुमान दयानिधि आप प्रभो | गुन सागर नागर पाहि विभो ||
अति पावन तत्त्व प्रकाशक हो | तुम राक्षस वंश विनाशक हो ||
अघनाशक रूद्र स्वरूप अहो | सुर श्रेष्ठ कपीश दयालु रहो ||
क्षिति भार हराय स्वराय प्रभो | शतमूर्तिर्मूर्ति मनाय विभो ||
उर में रघुनायक प्रीति घनी | प्रिय मित्र सुकंठ सुशील धनी ||
सिय खोज सुकंठ कराय रहे | बहु बानर भू पर धाय रहे ||
सिय की सुधि को कपि आतुर थे |कपि कुंजर सागर ऊपर थे ||
उड़ते कपि थे बजरंगबली | बुधि देखन को सुरसा मचली ||
कपि ने लघु रूप स्वरूप धरा |मुख जाय फिरा मन मोदु भरा ||
अहि मातु हुई हर्षित सुरसा | बहु आशिष पाय कपी हरषा ||
शत योजन सागर पार किया | मुदरी सिय को उपहार दिया ||
कपि कुंजर बाग़ उजार दिए | रण मध्य निशाचर मार दिए ||
हनुमान किये वध अक्षय का | वह था सुत रावण निर्दय का ||
घन गर्जन को घननाद करै | पर राघव दूत न रंच डरै ||
अज बान लगा कपि के तन में | बंधते कपिकुंजर बंधन में ||
सब लंक निशाचर हूह करैं | कपि बन्धन में मन मोदु भरैं ||
करि क्रोध दशानन पूँछि रहा | हम राघव दूत कपीस कहा ||
रघुनन्दन नारि हरी तुमने | जननी सिय खोज करी हमने ||
मति मंद कुबुद्धि कुचालि सुनों | सिय राम समर्पि सुबानि गुनों ||
शरणागत वत्सल राम हरे | रणकर्कश राघव चाप धरे ||
अति क्रोधित रावण बैन कहै | कपि दण्डित हो दुःख दर्द सहै ||
कपि पूँछ से प्रेम विशेष करै | एहि बानर की अब पूँछ जरै ||
सब राक्षस पूँछ जलाय रहे | बजरंगबली मुसुकाय रहे ||
हँस बैन कहे बजरंगबली | दशकंधर की अब लंक जली ||
रघुनायक का गुणगान किया | उछला कपि लंक जलाय दिया ||
सिय की सुधि दी रघुनन्दन को | अति हर्ष हुआ जनरंजन को ||
कपि वृन्दन को बुलवाय लिया | रण हेतु सुसैन्य बनाय लिया ||
फिर सागर सेतु अपार बना | पुर लंक में भीषण युद्ध ठना ||
घननाद मदान्ध चला रण को | उर शक्ति लगी तब लक्ष्मण को ||
हनुमान सजीवनि लाय दिये | वर लक्ष्मण वीर बचाय लिये ||
कुछ भी न दशानन युक्ति चली | जय लंक जयी बजरंगबली ||
तुलसी रघुनन्दन ध्यान किये | उनको प्रभु से मिलवाय दिये ||
हनुमान निवेदन को सुन लो | प्रभु दास मुझे अपना चुन लो ||
निज दर्शन देकर धन्य करो | उर में रघुनायक भक्ति भरो ||
मुझको अब राघव दर्शन हो | प्रभु प्रीति में जीवन अर्पन हो ||
शिवदास हुआ अति दीन दुखी | वर दो कर दो प्रभु धीर सुखी ||

करो पाठ शतबार, बजरंगी का ध्यान कर |
शिवशंकर अवतार, करें मनोरथ पूर्ण सब ||

आचार्य शिवप्रकाश अवस्थी
9412224548

2 Comments

  1. Er. Anuj Tiwari"Indwar" Anuj Tiwari 07/07/2015
  2. manoj charan manoj charan 08/07/2015

Leave a Reply