दुनिया किसका घर

ये दुनिया किसका घर , न ये तेरा न ये मेरा
ये तो बस चार दिनों का है इक फेरा

उसका दुःख, मेरी ख़ुशी, क्यों बन गयी फिर
बात बेबात सब में क्यों ठन गयी फिर

भूल गए क्या मंजिल को, या पता नहीं है
कौन सा ऐसे बृक्ष है जो धरा से कटा नहीं है

दुनिया जीतने निकला था जो सिकंदर
कुछ भी नहीं है अब उसके देश के अंदर

वक़्त के दरिया से तू कैसे बच पायेगा
आज मैँ चला तो कल तू भी जायेगा

मत कर गुमान इस चार दिन के उजाले को लेकर
सिर्फ अँधेरा ही साथ चलेगा तेरा साथ देकर

न तू किसी से बड़ा है , और न किसी से छोटा
अपने कर्मो के खेल से कोई हँसता है , तो कोई रोता

मान हित की बात , रख सुकर्मों की मशाल हाथों में
फिर होंगे चारो तरफ उजाले इन घुप रातों में

हितेश कुमार शर्मा

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