खामोश दिवारें

खामोश दिवारो से कोई आवाज तो आने दो
मेघ बने आंखो मे अब मुश्कान तो छाने दो
खोल कर देखो आंखे दुनिया वैसी ही तो हैं
बाहर सा सावन की हल्की फुहार तो आने दो
खामोश……….
कब तक सिसकियो मे यू जिया जाएगा
गुजरे हुए की याद को याद किया जाएगा
आया तुफान कितने ही घर उजड़ गए
हजारो तने दरफ्तो से अपने दूर हो गए
पर फिर जुट गए है सब नए की तलाश में
तुम भी सूखे मन मे कोई कल्सी पनपने दो
खामोश……..
जरा पूछ तो लो हाल औरो का कई मिल जाएंगे
तेरे घाव औरो के देख कम नजर आएंगे
क्यो गये की याद मे बचे को है खोना
समेट ले इनको बाहो मे जो बचा वही तेरा
इनके खातिर ही लब पर मुस्कान तो आने दो
खामोश………..
ये दुनिया की रीत हैं एक आता एक जाता हैं
हर रात के बाद सवेरा लौट के आता हैं
ये काल चक्र की आग में सब जल जाते हैं
ये बात है कोई पहले कोईबाद मे जाते हैं
वो चला गया पहले मन को बस इतना समझने दो
खामोश……..
जरा देखो तो एतिहास काल के कितने नजारे हैं
एक मॉ ने कई कई अपने लाल गवाये हैं
सरहद पर लाखो शहीद हुए वो हर एक बेटा हैं
पर भूल कर हर उस फूल को मॉ ने बचे फूल को सीचा हैं
तुम भी बचे हर फूल को उसका प्यार तो पाने दो
खामोश………

2 Comments

  1. Anurag Upadhyay 08/07/2015
    • arun kumar jha arun kumar jha 13/05/2017

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