चलो अच्छा किया तुमने

चलो अच्छा किया तुमने आए एक मोड़ से मुड़ कर
मेरे इस गम के सागर से तुझे उबरना जरूरी था
भला कब तक तुम्ही सहती रहती घुट घुट कर
मेरे मगरूर दामन को तुझे तजना जरूरी था
चलो………..
मै मगरूर कितना था अड़ज कागज के टुकड़ो को
दिया न मानकभी तुझको तेरे गृहणी सहारो को
हुआ एहसास मुझको अब गवा अनमोल दामन को
मुझे मेरे गुनाहो का सिला मिलना जरुरी था
चलो…….
कहा बदला है कुछ भी यहा वही घर है वही अपने
उतना ही कमाता हूं वही सोफे वही गमले
कभी आराम देते थे अभी हस्ते मुझे चुभते
मेरे मगरुर सीने मे कुछ टूटना जरुरी था
चलो……..
तुझे चाहता बहुत हूं दिलो जान से भी ज्यादा
मै नदी की धारा तू थी मेरा किनारा
बिखर रहा हूं अब मैं बिन किनारा के सहारा
लौट कर आजा मेरी शांसे बिन तेरे साथ अधूरी है

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