झूठी शान

सच्चाई को आज हर इन्सा बहुत छुपाता हैं
अपनी झूठी शान की खातिर झूठ ही बताता हैं
कमाता हैं चार तो आठ को बताता हैं
दूजे की नजर मे खुद को खुद से बड़ा दिखाता हैं
सच्चाई………..
क्या छुपाने से भला सच्चाई छुप जाती हैं
सौ दीवारे बीच मे हो फिर भी बाहर आती हैं
लबो से कोई कहता नही हर दर्द को छुपाता हैं
अन्दर हि अन्दर हर इन्सान घुटन को पाता हैं
हो चाहे हालात जो खुशहाल ही बताता हैं
बड़े बड़ाई मे अपना दुख और बढाता हैं
सच्चाई……….
सच पूछो तो ये करना चाहता नही कोई
पर क्या करे मजबूरी हैं रिवाज और शान जरूरी हैं
उसे सही करने को अपना ओकाद भुलाता हैं
सौ की जगह न चाह कर हजार फिर लुटाता हैं
सच्चाई……..

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