निगाहे बोलती हैं- अरूण कुमार झा बिट्टू

निगाहे बोलती हैं
इन्सान के हालात के पत्तो को खोलती हैं
क्या चल रहा हैं दिल मे क्या बीज किसी ने बोया हैं
क्या काटने की चाहत क्या अरमान दिल मे आया हैं
बस वो आंखे चाहिए जो पढ सके इसको
यह हर इन्सा के हर राज की कड़ियो को खोलती हैं
सचमुच निगाहे बोलती हैं

ये निगाहे कभी भक्ती के रंग डूबती हैं
ये कभी केवल साजन का संग ढूढती हैं
ये कभी कभी खुशियो से छलक भी जाती हैं
ये पगली कभी गम मे बरस भी जाती हैं
ये कभी ममता की सीतल छाया भी होती है
ये कभी काम क्रोध के विकार को भी ढोती हैं
यह हर एक दिल के हर भेद खोलती हैं
सचमुच……
इन्ही निगाहो से कभी गंगा प्रेम की भी बहती है
तो कभी इन्ही से लोभ और बेचैनी दिखती हैं
इसी मे सच्चाई का रंग भी दिखता हैं
तो इसी मे झूठ फरेब और घमण्ड भी दिखता हैं
कोई ओढ ले चादर ढक ले हजार रंगो से
पर यह तो सच्चाई का पट ही खोलती हैं
सचमुच………..
इन आखो की भाषा कही पढाई नही जाती
पर यह भाषा हैं एैसी जो सब जानते हैं
इसे बोध क्या अबोध क्या इसे शिक्छित अग्यान क्या
इसे बेजुबान जानवर भी पहचानते हैं
इसकी नही कोई सीमा नही है कोई दायरा
यह दुनियी के हर कोने मे बोली समझी जाती हैं
सचमुच……..

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