रिश्ते

रिश्तों की गर्मी,रिश्तों की नर्मी,
कुछ जलता,कुछ पिघलता,
कुछ कसकता,कुछ रिसता,
रिश्ते जुड़ते हैं,रिश्ते बिगड़ते हैं|
गुनाहगार बनाता है एक इन्सान दुसरे इन्सान को,
परिस्थितियाँ सहयोगी हैं उसके इस गुनाह में|
पर भागीदारी चरित्र और व्यवहार की,
बताता है एक इन्सान दुसरे इन्सान की|
सत्य के आवरण में लिपटा झूठ,
यही हकीकत है आज के रिश्तों की|
इंसान बह जाता है भावनाओं में,
आज कद्र कहाँ है संवेदनाओं की|
मूर्ख कहते है लोग उस इंसान को,
जो लिपटा है आज भी रिश्तों के जाल में|
खुद को जलाकर आग में, रिश्तें निभाता है,
सच पूछो तो अपने हाथों अपनी चिता जलाता है|

4 Comments

  1. Er. Anuj Tiwari"Indwar" Anuj Tiwari 05/07/2015
  2. Er. Anuj Tiwari"Indwar" Anuj Tiwari 05/07/2015
    • संध्या गोलछा 06/07/2015
  3. Gurpreet Singh 19/12/2015

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