परमानंद

सुख को धूंधा दर दर भटका
सुख ना मैने पाया
मोटर बंगला नोकर चाकर
सब कुछ मैने जुटाया
सब कुछ पल तो भाया मन को
पर चैन जिगर न आया
सुख……..
है थोड़ा मै और बनालू
और ये बढता जाए
तब सायद मुझे चैन मिलेगा
मन मेरा भरमाए
और बढाया खूब बनाया
लेकिन संतोष न आया
सुख…….
सब कुछ पा कर
लेकिन हार कर
जब हो गया मै बेचैन
जा बैठा संतो के बीच में
पाने ग्यान का नैन
तब मुझको मालूम हुआ
है बाहर कहा सुख चैन
अंतः सुख का मालिक बैठा
उसी से छटेगी रैन
सुख………
जब उससे नाता जोड़ा
परमान्नद को पाया
लोभ मोह सब दूर हुआ
मन संतोष मे आया
हर सुख है फीका जग का
उसके सुख के आगे
उसका प्रेम मिले तो मनवा
भूखे रागनी गावे
सुख……..

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