अभी बांकी था

अभी बांकी था
तेरे मेरे बीच में ,
कुछ तो था जो ,
अभी बांकी था
जिसे मै देखा करता था ,
तुम्हारी आँखों में .
कुछ तो था जो ,
जिसे मुझे तुमसे कहना था .
जिसे तुम्हे सुनना था .
पता नहीं क्यों ,
जब तुम मेरे सामने होती थी ,
कुछ कह नहीं पाता था.
जब भी हमारी पलकें टकराया करती थी
पता नहीं क्यों ,
वो झुक जाया करती थी
मै अपने रास्ते चल जाया करता था
तुम भी अपना रास्ता बदल जाया करती थी
तेरे मेरे बीच में ,
कुछ तो था जो ,
अभी बांकी था
मै तुमसे मिलने के लिए ,
तुम्हारे मोहल्ले के नुक्कड़ पर खड़ा रहता था.
और तुम मेरा इंतज़ार ,
बस स्टॉप पर किया करती थी
कॉलेज के आखरी दिनों में,
मुझे तुम्हे खोने का डर लगा रहता था
और तुम्हे भी
मुझे ना देखने का डर सताता रहता था .
पता नहीं क्यों
अधूरी बाते पूरी नहीं हो पाती थी .
चिपके जुबान कुछ कह ना कह पाते थे
आँखों की भाषा समझ नहीं पाते थे.
कुछ तो कहानी हमारी
अभी बाकी थी
जिसका पूरा होना
अभी बाकी था .

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