बारिश की बून्द

तिलमिलाती धूप थी
हवा मे थी बड़ी गरमाहट
हर चेहरा सूखा हुआ सा
जाने कहा खो गई थी मुस्कुराहट
लगता था निचोड़ा हुआ सा
थका थका सा रहता था बदन
पानी की ईक बून्द की खातिर
तरस रही थी धरा का मन

धन धन हो गए भाग्य सबके
आ गई बारिस की बून्द
झूम उठी धरा की आंचल
खिल उठे हरियाली से नूर
एैसे मे फिर बहका ये मन
प्रेमियो का फिर प्रेम की खातिर
सजना सजनी बेचैन हुए फिर
प्रेम की मीठी रैन की खातिर

बजानी पड़ी फिर उनको घण्टी
हो कर दिल से मजबूर
परदेशी सजना पर भी चढी
प्रेम की मीठी बातो का सरूर
फिर बिरहन ने निगोरे कह कर
कोसे हैं इन बादल को
याद कर साजन का संग
मून्द लिये भरी आंखो को

बुढापे ने भी ली करवट
इन पर भी प्रेम का रंग चढा
बूढी जुवा ने एक दूजे पर
प्रेम का मीठा टोन कसा
फिर बूढी दुल्हन ने हया से
चुरा लिए साजन से नैना
फिर बच्चो ने मौज किए
जो गर्मी से थे बेहद बेचैन

धन धन हो गए भाग्य सबके
एे बादल तेरा धन्यवाद
भरी गर्मी से दे दिया तूने
बेचैन मनवा को निजात
सही देती है सीख कुदरत
हर दर्द परे पल सुहाना है
एैसा है उसका काल चक्र की
रात बाद सवेरा आना ही आना हैं

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