मुझको हैं उड़ने का तलब

सारी दुनिया को अपने पंखो तले नापने पे बल
परिन्दा हूं मै परिन्दा बस मुझको है उड़ने का तलब
ना कोई सरहद हैं मेरा ना कोई सीमान हैं
सारी दुनिया मेरे खातिर खेल का एक मैदान हैं
हद से बढ कर हर हद की खिल्ली उड़ाने को सबल
परिन्दा………..
उड़ते उड़ते जब कभी मैं थक सी जाती हू
समेट कर अपने पंख जमी पे आती हू
राजा हो या रंक का घर,
मुझको क्या फर्क है क्या मजहब
जल मिले तो पी भी लू
दाने हो तो चुंग भी लू
भूख प्यास थकान मिटी जो
उसका कर के उड़ी सुकर
परिन्दा……..
बारिस की बून्दो को मै स्वीकार भी करती हू
सूरज की गर्मी से आखिर कब मै डरती हू
आ जाए प्रभात चाहे घनघोर हो काली रात
वक्त से डर कर मरे मानव मेरी नही हैं जात
भूखे पेट भी वक्त से लड़ने को रहती हू मै तत्पर
परिन्दा……….
कल के खातिर क्या मरना हाय तौबा करते रहना
आज पूरी हुआ तो कल बच्चे खातिर क्यो लड़ना
हर पल के हर कोने से खुशियो को चुनती रहती हू
दुख के कारण कभी नही मै सुख के कीरण ही ढूढती हू
थोड़े मे रहती हू खुश मानव जाने कब लेगा सबब
परिन्दा……..