मिट्टी

मैं अपने गाँव की मिट्टी का नन्हा छौना था।
अंबर थी रजाई, धरती ही बिछौना था।
पर मुझे तो विकसित होना था,
और मैं विकसित हुआ
विकास में ही मुझे खोना था।
पहले मेरे गाँव की मिट्टी से
सौंधी खुसबू आती थी,
पर हरित क्रांति में वो खो गई,
अब तो मेरे गाँव की हवा के साथ
मिट्टी तक जहरीली हो गई।
घुटन होने लगती है जब शहर में मुझे,
तो मन और तन लौटता है गाँव
की तरफ,
पर वहां भी तो हालात बदतर है।
किसको दोष दूं
मैं खुद भी तो जिम्मेदार हूँ।
पर मैं खुद को दोषी मानता नहीं,
और दूसरे किसी को जानता नहीं।
पर मेरा गाँव उदास है,
हरियाली है जहाँ विकास है,
पर फिर भी मेरा गाँव उदास है,
जहर भरा है मिट्टी में,
और अब जहरीले लोगों का ही वास है।

-मनोज चारण “कुमार”
mo. 9414582964

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