एै मनवा कर सम्भले काज

एै मनवा कर सम्भले काज
आए हवा का झोका तीखा
ले ले पीठ की आर
गैर स्ञी हैं विनाश की बेटी
कर दिहे सब कुछ खाक
एै………
यह जीवन है चढाई पहार की
साथ न कोई समान
एक बार जो फिसल गए तो
फिर सम्भलना मुशकिल काम
जीवन के उपन्यास जो लिख जाए ईक बार
फिर तो विधाता से भी न मिटिहे किये हुए कूकाज
ऐ………
आए है खाली हाथ एक दिन खाली जाना
जो रौल मिला हैं हमको उसको यहॉ निभाना
फिर काहे अपने मन से कुछ एैसा कर जाए
उठा न सका अपनो का सर तो काहे उनहे झुकाना
रख ले चुनरी को बेदाग
ऐ……

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