तलाक

खो गई मुहाब्बत वो प्रीत ना रही
ये जिन्दगी अब जीने की चीज ना रही
यहॉ हर कोई बेचैन है अच्छे कल की चाह में
सब वक्त काटते हैं आज बिन चाहत बिन प्यार मे
हवस आज चाहत की नीव रह गई
खो………
क्या मुहाब्बत एक प्यास है जो बुझ के खत्म हो जाए
क्या मुहाब्बत एक आग है जो जल के शांत हो जाए
क्या जिस्म तक मुहाब्बत की पहुच हैं काफी
क्या आत्मा मिलन की आज जरूरत ही नही
नही ये मुहाब्बत की रीत तो नही
हॉ खो……….
क्यो छोटी सी टकरार बन जाती है तलाक
क्यो कापता नही दिल सुन के एैसी बात
सब कुछ तो मिल गया था नन्हा फूल भी खिला था
फिर आ गई कहॉ से ये तलाक वाली बात
कारण हैं मिलन आत्मा अधूरी रह गई
खो……. .
मिले नही नसीब हो लैला मजनू के करीब
मौत पर मिले थे हीर रांझे के नसीब
फिर भी उनकी चाहत मशहूर हो गई
इतिहास के पन्नो पर मगरूर हो गई
सच ये है मुहाब्बत जिसमे आत्मा रही सरीक
खो……..

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