इस रात के कइ रंग हैं

इस रात के कई रंग है
कही गम कही उमंग है
कोई सोया हैं फुटपाथ पर
कोई गद्दे पर भी तंग हैं
इस रात…..
कही जग मग जग मग रौशनी
कही दीए मे भी तेल नही
कही मस्ती और जाम की रंग चढी
कही खाने को अनाज नही
यह कैसा प्रभू तेरा ढंग हैं
इस……..
कही ममता अंगड़ाई लेती हैं
कही सिस्की ले कर रोती हैं
सुन कर बहू बेटे की बाते
बूढी आखे अपनंग हैं
इस रात……
कही मिलने की है आस लगी
कही मिलने मे है थोड़ी देरी
कही तक तक नैना थक गए
कही नैनो पर है उपकार हुई
यह सौतेलापन इसके अंग हैं
इस……..
कोई लूटता हैं कोई लुटाता हैं
कोई दूजो को लूट सो जाता हैं
कोई छोटे छोटे लाभो के लिए
अपनो का गला दबाता हैं
ये क्या मानव का ढंग हैं
इस……..

2 Comments

  1. virendra pandey virendra pandey 03/07/2015
    • arun kumar jha arun kumar jha 13/05/2017

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