ऐ मन चल फिर गॉव की राह

ऐ मन चल फिर गॉव की राह
वो बच्चपन वसन्त की माह
जब रोज सभा कस टोन मजा
ठहाके लगाये जाते हैं
बिन उपहार खुशी से युही
जहा रोज मिले ही जाते है
जहा हर एक के दुख का सब मे आह
ऐ……
जैसे किसी गोरी ने अपना
पीला आंचल फैलाया हो
चन्चल स्वच्छ हवाओ ने उनको
छेरा हो गुदगुदाया हो
उन सरसो के खेतो ने कसम ली
गॉव सम रहने की चाह
छुपा दिये उनहोने बढ कर
बांटने वाले पगडन्डी की राह
जहा भवरे चूमे उनको मगन हो
खुशबू प्रेम समय का करे अगाह
ऐ………
जहा सुबह पत्तो पर सबनम
पंख फैला इन्तजार करे
पा कर सूरज की किरणे
ये हीरे सी मुस्कान भरे
चहक चहक कर चिड़ियो का गुट
प्रेम का इनका बखान करे
हवा गन्ध चुरा पुष्पो से
फिजा बिखेर अलंकार करे
जहा की हर एक रोज सुबह देख
पुलकित हो जाये मनवा
ऐ………
होते शाम सूरज अपनी
चलने को करे तईयारी
आती है निशा इठलाती हुई
पहन कर सारी काली
चान्द तारे गढे मोती सम
गगन मे आचल फैलाए
कही छुपा झिन्गुर और मेढक
बैठा राग सुनाए
शांती और मीठा सकून
करे जहा हर रोज प्रवाह
ऐ मन………….

4 Comments

  1. Dushyant Patel 01/07/2015
    • arun kumar jha arun kumar jha 13/05/2017
  2. डी. के. निवातिया dknivatiya 01/07/2015
    • arun kumar jha arun kumar jha 13/05/2017

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