मैं कब से बैठा हूँ इसी सोच में गुमसुम-गुमसुम

मै कब से बैठा हूँ इसी सोच में गुमसुम-गुमसुम,
कैसे शब्दों में लिखूँ अपने मन की बात।
बेतहासा जरूरतों ने कर दिया जुदा सबको,
पतझड़ में कैसे लिखूँ अब मैं सावन की बात।
गांव में पथरा गयी इंतजार में बूढ़ी आँखे,
ईएमआई के फेर में भुला रिश्ते पावन की बात।
उम्मीदों के बोझ से झुक गए कांधे नोनिहाल के,
होड़ की अंधी दोड़ में बेमतलब बचपन की बात।
अब कहाँ किसे फुरसत है अपने ही मायाजाल से,
किससे अब साझा करूँ मैं अपनी उलझन की बात।
कंक्रीट के घने जंगल बस रहे बस चारों और,
फिर कहाँ पर्यावरण की और कहाँ उपवन की बात।
मैं कब से बैठा हूँ इसी सोच में गुमसुम-गुमसुम………

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