ग़ज़ल –: नाकाम से डर जाते है…..(शायरी

ग़ज़ल –: 1

बन्दिशे , रन्जिशे , नाकाम से डर जाते है !
हम अपनो की डाली लगाम से डर जाते है !

मकाम की चाह पे गुमनाम सी है जिन्दगी ,
जाने क्यू आज , हम हर काम से डर जाते है !!

महखाने मे बैठे तो जाम से डर जाते है !
पीने के बाद उसके अन्जाम से डर जाते है !

डर लगता है जालिम जमाने की बेहयाओ से ,
कोई करता बेअदाई , हम इमाम से डर जाते है !!

हम ईमान पे जीते , अस्काम से डर जाते है !
दगावाजी की होड मे , इन्तिहाम से डर जाते है !

इन्तिकाम ने अच्छे अच्छो को नाबूद कर दिया ,
यहा फिदा से डरने वाले , इन्तिकाम से डर जाते है !!

ग़ज़ल –:2

हम कायरो के झूठे गुनगान से डर जाते है !
झूठी आडम्बर और मीठी मुस्कान से डर जाते है !

एक ऐसी निजाम शदियो से चली आई ,
अपमानित करने वाले भी अपमान से डर जाते है !!

अब हम गीता और कुरान से डर जाते है !
मजहवी चलन पे हिन्दू और मुसलमान से डर जाते है!

इन्सानियत का दौर कुछ इस कदर आया ,
आज के इन्सान , इन्सान से डर जाते है !!

स्वार्थ की दुनिया मे , अहसान से डर जाते है !
खुदगर्जी के आलम मे , फरमान से डर जाते है !

ऐवानो मे रहने वाले हमे नीलाम न कर दे ,
दौर के उन ऐसे , धनवान से डर जाते है !!

अनुज तिवारी

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