उफ ये शहर की जिन्दगी

ऊफ ये शहर की जिन्दगी भागती हुई दौरती हुई
रूटीन के ताबीज में इन्सान को गढती हुई
वक्त के चादर को और भी समेटती हुई
सकून की दौलत को इन्सान से छीनती हुई
ऊफ………..
रिस्तो की नीव को खोखली करती हुई
मुहाब्बत की चाहत को सिक्को मे तौलती हुई
यादो से राहत को फोन पे समेटती हूई
आदमी से आदमी को दूर ये करती हुई
ऊफ………..
वाहनो की भीड़ मे धुओ की जागीर मे
दौलत की भूख मे झूठे सुख की जीत में
एक दूसरे को पीछे धकेलती हुई
ये आदमी से आदमी का पहचान छीनती हुई
ऊफ……….
चान्द की खूबसूरती यहॉ गाव सी होती नही
सितारो की रौशनी चका चौध मे दिखती नही
सुध्दता के नाम पर यहा जल तक मिलती नही
क्या करे कुदरत भी हैं इन्सान से हारती हुई
ऊफ………

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