मुहाब्बत संग हैं ऐसे

मुहाब्बत संग हैं ऐसे जगत की नीव ही समझो
हैं इन्सा पानी बिन मछली वो जिसके पास ये न हो
जो मम्ता से भरी जननी लगाती सीने नही अपने
मुहाब्बत बौछार सावन सा कोई करता नही बढकर
कहा मुम्मकिन था कुछ दिन भी सम्भलते जीवन के डोर
मुहाब्बत….
नदिया बह रही कल कल सागर में समाने को
लहरे टकराती साहिल से नदी को साथ लाने को
चान्द निकलता हैं हर रात धरा के मुस्कुराने को
सितारे देते ईसका साथ प्यार और बढाने को
कलिया खिल रही हस कर भवरे चूम ले उनको
मुहाब्बत………..
सूरज की कनक किरणे धरा के पास आती हैं
हटा चादर धरा अंधेरा मिलन से निखार पाती हैं
मिलन की तीब्र ही इच्छा धरा उभरा हुआ पर्वत
हवा बेताब बहे सर सर सासो में समाने को
मुहाब्बत……….
बिछा मैदान चिरवा सीना चुपचाप अनाज उगवाता हैं
कदम कही रोके न किसान अपना रक्त छुपाता हैं
खरा हर पेड़ छतरी तान ठहरे राही मुस्कान बस भर दे
झुका लिय हैं कोइ फल खुशी से स्वाद को चख ले
तलाब रोके बैठा जल चाहत प्यास को तज दो
मुहाब्बत……….

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