सत्य धरा का

सत्य है कुछ नहीं धरा पर
सिवाय उस अजेय मृत्यु के
जन्म सच नहीं कर्म सच नहीं
ये सामाजिक बंधन और रिवाज

साथी सच नहीं, शादी सच नहीं
सच नहीं ये प्राण और परिवार
मंजिल सच है सबकी अडिग
वो मृत्यु की धार

भूगोल सच नहीं , गणित सच नहीं
और झूठा है विज्ञानं
तब जीवन का अर्थ समझेंगे
जब अजेय का पाये ज्ञान

ख्याति , कुख्याति , लोग भांति – भांति
बड़े गजराज -ह्वेल से लेकर छोटी पिपलिका पाँति
सबकी मंजिल एक है चाहे
कुछ हो पद , व्यसाय और धर्म या जाती

लड़ाई झगडे , ईर्ष्या -द्वेष
क्रोध -काम और लोभ मोह
नश्वर उन्माद ये है फिर भी
कुछ पाने के लिए विद्रोह

धन और दौलत चलते है तब तक
सांस बराबर चलती है
फिर आपके लिए अचल है
दुनिया इस पर पलती है

आये राम , वो भी चले गए
नियमो से प्रकृति के
नियति का ये पालन करना था
वो भी मिट्टी के अकिृति थे

वो परमात्मा मे विलीन हो गए , मेरा मन घाट से आने के बाद ब्याकुल था , और सब मृदा मात्र लग रहा था , और लगता है धरा का कोई सत्य नहीं , सब परिवर्तनशील है … विषय , कर्म , रिवाज और ग्रहो की गति इत्यादि ….

इसपर एक रचना लिखनी थी अपना विचार प्रकट करना था बस उपरोतक पंक्तिया २००६ के उस रात लिखी …. महेंद्र सिंह किरौला

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