तलाक़-शुदा औरत की दास्ताँ ……..

दुनिया वालों तुमने मुझे एक नया नाम दिया “बेचारी “,
इस नाम से कितने दिनों तक मैंने अपनी ज़िन्दगी गुजारी,
पर अब नहीं बहुत हुआ कुछ कहने की है अब मेरी बारी |
क्यूँ आखिर थी मैं हारी , मेरी ज़िन्दगी क्यूँ बना दी गयी थी बेचारी ?
क्या था गुनाह मेरा जो दुनिया वालों ने मुझे पत्थर दे मारी ?
क्या ये था गुनाह मेरा जो मैंने अपने साथी से सारे रिश्ते तोड़ डाली ?
या ये था गुनाह मेरा जो मैंने उसके खिलाफ दो लफ्ज़ बोल डाली ?
अगर ये था गुनाह तो गुनाह ही सही ,
पर मुझे किसी के तलवे के नीचे दबना था गवारा नहीं ,
बिन गलती किये ताने सुनना मुझे था बर्दास्त नहीं .
मैं एक औरत हूँ किसी की हाथ की कठपुतली नहीं ,
मैं थी कोई बेबस या लाचार नहीं ,
जो अपने पैरों पर थी खड़ी हो सकती नहीं ,
किसी की गुलामी करनी थी, जो मेरी फितरत में नहीं,
मेरे भी इन आँखों की पलकों पर था सपना सजा ,
मेरे दिल में भी था कुछ अरमान भरा ,
उन सपनों और अरमानों को उनलोगों ने चूर कर डाला ,
मुझे एक चारदीवारी में बंद कर डाला ,
तब मैं औरत से एक कैदी थी बन गयी ,
उसी दिन मेरे दिल से एक आवाज़ आयी……
आखिर ये शर्म और पर्दा क्यूँ ……..???
क्या गुनाह को दबाना एक सबसे बड़ा गुनाह नहीं??
तेरी तो ख्वाहिश एक नयी उड़ान भरने की है ,
चारदीवारी में बंद रहना तेरी मंज़िल नहीं ,
बढ़ा कदम और तोड़ डाल ये बेड़ियां,
जो लगाती है हम औरतों की आज़ादी पर पाबंदियां..|
फिर मैंने तोड़ डाली वो सारी बेड़ियां ,
मेरे अंदर भी जूनून ,ज़ज़्बा और एक नेक इरादा था ,
मैं इस जुर्म का अंत करके अपनी उड़ान भरुंगी, ये खुद से मेरा वादा था |
कैसे ना पूरा करती उस वादें को ,
कैसे ना एक नया मुकाम देती उस नेक इरादे को….
कठिनाइयां आयी रुकावटें आयी पर भी हिम्मत से काम लिया ,
और फिर मुझे एक और नया नाम तलाक़-शुदा मिला …..
पर इस नाम ने मुझे आज़ादी महसूस करायी ,
और जुर्म के चंगुल से मुक्ति दिलायी……||
समाज का काम है दूसरों पर कीचड़ उछालना,
पर समाज के डर से ऐसा नहीं की ,
हम भूल जाएँ अपना फ़र्ज़ निभाना |

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