मैं और वो नन्हा मासूम

मैं मस्ती में था झूमता हुआ ,
अपने मंजिल के रास्ते को चूमता हुआ ,
आगे -आगे बढ़ते ही जा रहा था ,
हर कठिनाइयों के समुन्दर को लांघता हुआ |
सामने नज़र पड़ी मेरी ,कुछ हैवान लोग थे खड़े ,
उन हैवानों को देखा एक मासूम कुत्ते को बेरहमी से पीटते हुए ,
मेरी मंज़िल की ओर चलते कदम डगमगा से गए ,
उन हैवानों की हैवानियत को देखते हुए |
मेरी आँखें डबडबा- सी गयी ,
उस मासूम बेज़ुबान की चीख़ सुनते हुए |
मैंने सोचा मेरी मंज़िल से तो जरुरी इस मासुम को बचाना है ,
शायद इस मासूम को भी मेरी मदद की जरुरत है ,
मैंने उन हैवानों को बोला , आखिर कसूर क्या है इस नन्हे मासूम की ,
अरे रहम करो ये भी बेचारा किसी की औलाद है ,
अरे ये तो सोचो क्या बीतेगी तुम पर ,
जब कोई ऐसे ही जुर्म करेगा तुम्हारी औलाद पर |
डरो ख़ुदा से क्या पता अगले जन्म में तुम भी बेज़ुबान होगे ,
फिर तुम कैसे किसी से मदद लोगे ??
पर अपने आगे उन्होंने मेरी एक न सुनी ,
फिर वो हैवान उसे अधमरा करके चले गए ,
उस नन्हें मासूम को कराहते हुए छोड़ गए ,
मैंने उसे अपने साथ घर को ले आया ,
उसके जख़्म पर मरहम लगाया ,
उसको अपने ही घर में पनाह दिया ,
मैंने उसको अपना सबसे अच्छा दोस्त बनाया ,
उस बेनाम दोस्त को एक नाम “मस्ती ” दिया ,
क्यूंकि उसके मिलने से पहले मै मस्ती में था झूमता हुआ|

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