दिल-ए-धर्मशाला

एक तन्हाई और एक बेवफाई,
इन दोनो ने मिलकर ,
मेरे बेगाने दिल को
धर्मशाला बना दिया !
लोग आते गये ,
हमे आजमाते गये ,
खूब्सूरत महखाने के
मह का प्याला बना दिया !
महक रही मह तरह-तरह की,
ऐसी वो मधुशाला बना दिया !!

पहले तो प्यार मे धोखा मिल गया ,
फिर अब तनहाई का झोका मिल गया ,
शुआये उनकी बद्दुआओ की काम आई
हमे गमे बादियो का झरोखा मिल गया !!

वो गये कुछ इस कदर हमे बदनाम करके ,
हिसार सा गम मेरे नाम कर के ,
गुमनाम सी जिन्दगी सिमटी है कोठे पे
लोग ऐवान से आते बडे दाम भरके !

तेरे प्यार पे मिली ऐसी जदा है ,
जर्ब दिल मे जहन मे जफा है ,
बेवफा तेरी गलीज हरकतो से
आब-ए-चश्म निशान-ए-वफा है !

(शायर – अनुज तिवारी इन्दवार म प्र )
शुआये= किरण
ऐवन= महल
जदा= चोट खाया हुआ
जर्ब= धाव.
जफा= अत्याचार
आब-ए-चश्म= आसू
गलीज= अश्लील Ghh

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