कमल और गुलाब !!

एक गुलाब था और एक कमल ,
बहस छिडी जा राजमहल !
किस्से मेरे लाजबाब ,
मै पुष्पराज कह रहा गुलाब !

गुलाब —
रंग-रंग का अंग मेरा
हर रंग से संग मेरा
गर मै लाल रंग का हूँ
आशिक का मन भाता हूँ

गर मै स्वेत वरण मे हूँ
मारीज को बहलाता हूँ
गर मै नीला आसमानी
मन को शान्ति दिलाता हूँ

गर मै पीला पीताम्बर सा
देव गण को हर्षाता हूँ
घर-घर मे मेरा राज
चर्चे मेरे फैले आज

तू कमल खिलता दलदल मे
और पला मै राजमहल मे
मेरे सेबक माली मालन
करते मुझ पर सब कुछ अर्पन

राजमहल का मान बढाता
मै मेहमानो का मन हर्षाता
सुन्दर से ये बाग-बगीचे
मेरे बिना सब के सब फीके

है मेरी बात का कोई जबाब !
मै “पुष्पराज” कह रहा गुलाब !!

कमल–
हे मन्त्री सखा और राजन!
स्वीकार करे मेरा नमन !!

बाते सब करके अमल
सर उठा बोला कमल
भाई गुलाब तू महान है
पर मेरी भी कोई आन है

माना तू रंग रंगीला है
पर बदन तेरा कटीला है
तेरे जैसे बहुत बाग मे
तपते रहते धूप आग मे

भोर भई , जब तू खिला
माली करता दाखिला
कलियाँ-कलियाँ तेरी छोडकर
गठरी भरता तुझे तोडकर
ठंडे पडते तेवर तेरे
जब तुझे बेचता रोज सबेरे !!

One Response

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 02/09/2015